मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

रात

नीले नभ के तले, दो ह्रदय जो मिले,
मुस्कुराया गगन चाँदनी छा गई ।
मुस्कुराने लगी फूलों की डालियाँ,
गुनगुनाती भंवर रागिनी आ गई।

चाँद तारों के दीपक सजाने लगा,
पी- कहाँ- पी- पपीहा बुलाने लगा,
प्यार का रंग हर ओर छाने लगा,
रात कुछ ऐसी मनभाविनी आ गई।

खोई- खोई दिशा जगमगाने लगी ,
सहमी सहमी हँसी खिलखिलाने लगी,
रात ढलने लगी लो लजाती हुई ,
जैसे शर्मीली कोई दुल्हन आ गई ।

चाँदनी के बहाने जरा छुप के आ,
बात खुलने न पाये जरा चुपके आ ,
रात भी आ गई चाँद भी आ गया ,
जैसे तारों की झिलमिल बारात आ गई।

-नथुनी पाण्डेय "आजाद"-